Tuesday, April 20, 2010

पूछो

पूछो गुलों से कि याद हमें आपकी किस कदर आती है,
कि गुल ही शर्मा जाते हैं हम देखते हैं जब उन्हें,
हर गुल में जो शबीह आपकी नज़र आती है।

पूछो हवा से कि क्यों बहती नहीं इस तरफ,
खुशबू जो हमें आपकी तडपाती है।
कैसे बनेगी उस लायक ये हवा,
सो मुह फेर कहीं और चली जाती है।

पूछो रात ये सितारों से क्यों टिमटिमाती है,
घनी काली अँधेरी क्यों नहीं हो जाती है?
जुल्फें जो हैं आपकी हमारे ख्वाबों में,
ये रात दिन बन कर हमे जगाना चाहती है।

फिर पूछो कि क्यों है हमें आपसे ये बेशुमार मोहब्बत,
कि हर रात ख़मा हमारी प्यार क्यों बरसाती है?
ज़हीर हैं आप हमारे हर ज़र्रे में है आपका नाम,
हर नुख्ते में तस्वीर आपके तिल कि जो नज़र आती है!

8 comments:

  1. "हर गुल में जो शबीह आपकी नज़र आती है।"
    गुलाबी अंदाज बहुत खूब लगा - बधाई

    ReplyDelete
  2. मौहब्बत का आपका अंदाज़ बहुत अच्छा लगा. भाषा में शालीनता बहुत अच्छी लगी. बधाई

    ReplyDelete
  3. Nice attempt.....!!!! Congrates...!!!!

    http://idharudharki1bat.blogspot.com

    ReplyDelete
  4. हिन्दी ब्लॉगजगत के स्नेही परिवार में इस नये ब्लॉग का और आपका मैं ई-गुरु राजीव हार्दिक स्वागत करता हूँ.

    मेरी इच्छा है कि आपका यह ब्लॉग सफलता की नई-नई ऊँचाइयों को छुए. यह ब्लॉग प्रेरणादायी और लोकप्रिय बने.

    यदि कोई सहायता चाहिए तो खुलकर पूछें यहाँ सभी आपकी सहायता के लिए तैयार हैं.

    शुभकामनाएं !


    "टेक टब" - ( आओ सीखें ब्लॉग बनाना, सजाना और ब्लॉग से कमाना )

    ReplyDelete
  5. आपका लेख पढ़कर हम और अन्य ब्लॉगर्स बार-बार तारीफ़ करना चाहेंगे पर ये वर्ड वेरिफिकेशन (Word Verification) बीच में दीवार बन जाता है.
    आप यदि इसे कृपा करके हटा दें, तो हमारे लिए आपकी तारीफ़ करना आसान हो जायेगा.
    इसके लिए आप अपने ब्लॉग के डैशबोर्ड (dashboard) में जाएँ, फ़िर settings, फ़िर comments, फ़िर { Show word verification for comments? } नीचे से तीसरा प्रश्न है ,
    उसमें 'yes' पर tick है, उसे आप 'no' कर दें और नीचे का लाल बटन 'save settings' क्लिक कर दें. बस काम हो गया.
    आप भी न, एकदम्मे स्मार्ट हो.
    और भी खेल-तमाशे सीखें सिर्फ़ "टेक टब" (Tek Tub) पर.
    यदि फ़िर भी कोई समस्या हो तो यह लेख देखें -


    वर्ड वेरिफिकेशन क्या है और कैसे हटायें ?

    ReplyDelete
  6. कली बेंच देगें चमन बेंच देगें,

    धरा बेंच देगें गगन बेंच देगें,

    कलम के पुजारी अगर सो गये तो

    ये धन के पुजारी वतन बेंच देगें।

    हिंदी चिट्ठाकारी की सरस और रहस्यमई दुनिया में राज-समाज और जन की आवाज "जनोक्ति "आपके इस सुन्दर चिट्ठे का स्वागत करता है . . चिट्ठे की सार्थकता को बनाये रखें . नीचे लिंक दिए गये हैं . http://www.janokti.com/ , साथ हीं जनोक्ति द्वारा संचालित एग्रीगेटर " ब्लॉग समाचार " http://janokti.feedcluster.com/ से भी अपने ब्लॉग को अवश्य जोड़ें .

    ReplyDelete